बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चैतन्य बघेल की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच और उसमें हो रही देरी पर कड़ी टिप्पणी की है। जस्टिस अरविंद वर्मा की सिंगल बेंच ने स्पष्ट कहा कि मुकदमे से पहले लंबी अवधि तक हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अदालत ने दो टूक कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली ऐसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती, जहां कारावास नियम बन जाए और मुकदमा अपवाद।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में जांच मुख्यतः दस्तावेजी प्रकृति की है और आवेदक लंबे समय से हिरासत में है। ईडी द्वारा पीएमएलए की धारा 50 के तहत दर्ज बयान, डिजिटल व वित्तीय रिकॉर्ड पहले ही रिकॉर्ड पर हैं। इन साक्ष्यों का मूल्यांकन ट्रायल के दौरान होगा, न कि जमानत के चरण में।
जांच में देरी पर सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप पत्र दाखिल करने और संज्ञान लेने में अनावश्यक देरी न्याय व्यवस्था को कमजोर करती है। त्वरित जांच और सुनवाई आरोपी, पीड़ित और समाज—तीनों के हित में है। जांच अनिश्चित काल तक नहीं चल सकती और आरोपी को एक समय के बाद अपने ऊपर लगे आरोपों के बारे में स्पष्टता का अधिकार है, ताकि वह अपना बचाव तैयार कर सके।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला
कोर्ट ने मनीष सिसोदिया बनाम सीबीआई एवं ईडी (2024) का हवाला देते हुए कहा कि जहां मुकदमे का समय पर समाप्त होना संभव नहीं है, वहां विशेष कानूनों के तहत भी लंबी प्री-ट्रायल हिरासत अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है—यह सिद्धांत आर्थिक अपराधों पर भी लागू होता है।
साथ ही, सह-आरोपी अनिल टुटेजा के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन माह में जांच पूरी करने के निर्देश का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि समान परिस्थितियों में कम गंभीर भूमिका वाले आवेदक को लंबे समय तक हिरासत में रखना समता (अनुच्छेद 14) के सिद्धांत के विपरीत होगा।
“आशंकाएं सबूतों पर आधारित हों, अटकलों पर नहीं”
ईडी के इस तर्क को कि आवेदक का राजनीतिक प्रभाव है, कोर्ट ने केवल आशंका के आधार पर जमानत से इनकार का पर्याप्त कारण नहीं माना। अदालत ने कहा कि गवाहों को धमकाने या न्याय में बाधा डालने के ठोस प्रयासों के अभाव में जमानत रोकी नहीं जा सकती। दस्तावेजी व डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित होने से छेड़छाड़ की आशंका भी कम है।
भूमिका कम, सह-आरोपी पहले ही जमानत पर
कोर्ट ने पाया कि चैतन्य बघेल की कथित भूमिका कई वरिष्ठ सह-आरोपियों की तुलना में कम है, जिन्हें पहले ही सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है। ईडी द्वारा प्रस्तुत सामग्री में आवेदक के नाम कोई प्रत्यक्ष दस्तावेज, बैंक खाता, संपत्ति या वित्तीय साधन नहीं मिला, जो अपराध की आय से सीधे जुड़ाव सिद्ध करे। आरोप मुख्यतः बयानों और प्रभाव के दावों पर आधारित हैं।
सशर्त जमानत की शर्तें
हाईकोर्ट ने कड़ी शर्तों के साथ जमानत दी है—
पासपोर्ट होने पर सरेंडर करना होगा।
ट्रायल कोर्ट में नियमित व समय पर उपस्थित रहने का शपथपत्र देना होगा।
सुनवाई में सहयोग न करने या शर्तों के उल्लंघन पर जमानत रद्द की जा सकेगी।
