Wednesday, January 21, 2026

Sakat Chauth Fast : मातृत्व की शक्ति का प्रतीक सकट चौथ, गणपति से लंबी उम्र की कामना

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Sakat Chauth Fast, नई दिल्ली, 4 जनवरी 2026– ठिठुरती ठंड और माघ मास की पवित्रता के बीच, भारतीय घरों में एक बार फिर उस प्राचीन परंपरा की तैयारी शुरू हो गई है जो मां और संतान के अटूट रिश्ते को परिभाषित करती है। सकट चौथ, जिसे संकट चौथ के नाम से भी जाना जाता है, केवल एक धार्मिक उपवास नहीं बल्कि विश्वास का वह धागा है जिसे माताएं अपनी संतान की सुरक्षा और लंबी आयु के लिए गणपति बप्पा के चरणों में बांधती हैं।

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श्रद्धा और समय का दिव्य संगम

इस वर्ष की गणना बताती है कि वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आगमन 6 जनवरी की सुबह 08 बजकर 01 मिनट पर होगा। यह व्रत पूरी तरह से अनुष्ठानिक शुद्धता पर आधारित है, जहाँ सूर्योदय से शुरू होकर रात को चंद्रमा के दर्शन तक चलने वाली यह तपस्या 7 जनवरी की सुबह तक जारी रहेगी। इस दौरान भक्त न केवल निर्जला उपवास रखते हैं, बल्कि तिल और गुड़ जैसी विशेष वस्तुओं का दान कर अपने कष्टों के निवारण की कामना करते हैं।

मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से की गई पूजा और शाम को चंद्रमा को दिया गया ‘अर्घ्य’ ही व्रत को पूर्णता प्रदान करता है। यही वह क्षण होता है जब एक भक्त का धैर्य और भगवान गणेश की असीम अनुकंपा एक बिंदु पर मिलते हैं। माताओं के लिए यह दिन केवल भूख को सहना नहीं है, बल्कि अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए किया गया एक भावनात्मक निवेश है।

परंपराओं के पीछे छिपा गहरा अर्थ

सकट चौथ का महत्व केवल इसके मुहूर्त तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार में बड़ों के प्रति सम्मान और परंपराओं के हस्तांतरण का प्रतीक है। आधुनिक युग में भी इस व्रत की लोकप्रियता कम नहीं हुई है, क्योंकि यह संतान की दीर्घायु के उस आशीर्वाद से जुड़ा है जिसे हर युग में सर्वोच्च माना गया है। गणेश जी को ‘विघ्नहर्ता’ कहा जाता है, और भक्त मानते हैं कि इस दिन की पूजा साल भर के आने वाले संकटों को टालने की शक्ति रखती है।

अध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो यह व्रत आत्म-संयम और त्याग की सीख देता है। दान की परंपरा यह सुनिश्चित करती है कि त्योहार की खुशी केवल एक घर तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के जरूरतमंद तबके तक भी पहुंचे।

क्या कहती है धार्मिक मान्यता

“धार्मिक मान्यता के अनुसार, सकट चौथ के दिन विधिपूर्वक व्रत करने से संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और चंद्रमा को अर्घ्य देने से व्रत का पूर्ण फल मिलता है।”

यह सूत्र इस पर्व की आत्मा है। विद्वानों का मानना है कि चंद्रमा की शीतलता और गणेश जी की बुद्धि का मिलन भक्त के जीवन में स्थिरता और शांति लेकर आता है।

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