Saturday, January 17, 2026

फेफड़ों का कैंसर: तेजी से बढ़ रहा खतरा, धूम्रपान अब भी सबसे बड़ा कारण

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फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर) दुनिया भर में तेजी से बढ़ता स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। यह एक घातक रोग है जिसमें फेफड़ों की कोशिकाएँ अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं, ट्यूमर का रूप ले लेती हैं और धीरे-धीरे फेफड़ों की क्षमता को कम करती जाती हैं। समय रहते इलाज न मिलने पर यह शरीर के अन्य अंगों तक भी फैल सकता है, जिससे मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है।

दो प्रमुख प्रकार—NSCLC और SCLC

चिकित्सकों के अनुसार लंग कैंसर मुख्यतः दो प्रकारों में पाया जाता है—

1. नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC)
यह सबसे आम प्रकार है और लगभग 80–85% मामलों में पाया जाता है। इसके तीन उपप्रकार हैं—

  • एडेनोकार्सिनोमा: म्यूकस बनाने वाली कोशिकाओं में उत्पन्न होने वाला कैंसर, यह उन लोगों में भी पाया जाता है जो धूम्रपान नहीं करते।

  • स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा: यह बड़े वायुमार्गों के पास विकसित होता है और अक्सर धूम्रपान से जुड़ा रहता है।

  • लार्ज सेल कार्सिनोमा: तेजी से बढ़ने वाला कैंसर, जिसका पता देर से चलता है।

2. स्मॉल सेल लंग कैंसर (SCLC)
लगभग 10–15% मामलों में पाया जाने वाला यह कैंसर अत्यंत तेजी से फैलता है और लगभग हमेशा धूम्रपान से जुड़ा होता है। इसकी वृद्धि दर तेज होने के कारण यह अधिक खतरनाक माना जाता है।

धूम्रपान सबसे बड़ा कारण—85–90% मामलों में जिम्मेदार

विशेषज्ञों के अनुसार फेफड़ों का कैंसर फेफड़ों की कोशिकाओं के डीएनए में परिवर्तन के कारण होता है, जिसके पीछे मुख्य कारण धूम्रपान है।
सिगरेट, बीड़ी, हुक्का और अन्य तंबाकू उत्पादों में पाए जाने वाले कार्सिनोज़न फेफड़ों को धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त करते हैं और कैंसर की संभावना बढ़ाते हैं।

इसके अलावा अन्य जोखिम कारक भी उतने ही खतरनाक हैं—

  • सेकंडहैंड स्मोक (दूसरों के धूम्रपान का धुआँ)

  • रेडॉन गैस का संपर्क

  • एस्बेस्टॉस और औद्योगिक रसायन (आर्सेनिक, डीज़ल धुआँ आदि)

  • वायु प्रदूषण

  • अनुवांशिक कारण या पहले से फेफड़ों की बीमारी

विशेष बात यह है कि आजकल धूम्रपान न करने वाले लोगों में भी फेफड़ों का कैंसर बढ़ रहा है, जिसका कारण प्रदूषण और रसायनों का बढ़ता प्रभाव माना जा रहा है।

विशेषज्ञों की चेतावनी—समय रहते पहचान जरूरी

डॉक्टरों का कहना है कि लगातार खांसी, सीने में दर्द, सांस लेने में कठिनाई, आवाज बैठना, वजन घटना या खून की खांसी जैसे लक्षणों को हल्के में न लें। शुरुआती चरण में इस बीमारी का पता चल जाए, तो उपचार के बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

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