Judicial Activism : नई दिल्ली: देश में न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) आवश्यक है, लेकिन इसकी एक सीमा होनी चाहिए। यह बात चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बीआर गवई ने सोमवार को कही। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद (Judicial Terrorism) में नहीं बदलनी चाहिए।CJI गवई यह टिप्पणी पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एफआई रिबेलो की किताब ‘Our Rights: Essays on Law, Justice and the Constitution’ के विमोचन कार्यक्रम के दौरान कर रहे थे। इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जज विक्रम नाथ समेत कई वरिष्ठ वकील और न्यायाधीश भी उपस्थित थे।
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न्यायपालिका की भूमिका और सीमा
CJI गवई ने कहा कि जब भी विधायिका या कार्यपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में असफल होती है, तब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसे संवैधानिक न्यायालयों को आगे आना पड़ता है।उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक सक्रियता के दायरे को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अगर न्यायिक सक्रियता अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बढ़ती है, तो यह न्यायिक आतंकवाद का रूप ले सकती है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है।
जस्टिस रिबेलो की किताब का महत्व
CJI गवई ने बताया कि जस्टिस रिबेलो ने अपनी किताब में स्पष्ट रूप से बताया है कि जजों को किस सीमा तक न्यायिक सक्रियता अपनानी चाहिए। किताब में विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से यह समझाया गया है कि न्यायपालिका को कब और कैसे हस्तक्षेप करना चाहिए और कब नहीं।
