Wednesday, February 11, 2026

“एक पेड़ मां के नाम” अभियान पर भारी प्रशासनिक लापरवाही: कोरबा में नीलगिरी के दर्जनों पेड़ों की कटाई, जवाबदेही तय करने से कतरा रहे अधिकारी

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कोरबा। प्रधानमंत्री द्वारा पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से शुरू किए गए “एक पेड़ मां के नाम” जैसे राष्ट्रीय अभियान के बीच कोरबा शहर में हुई नीलगिरी के दर्जनों पेड़ों की कटाई ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बालकों रोड क्षेत्र में वन विकास निगम द्वारा लगाए गए बड़े नीलगिरी पेड़ों को जिस तरह अवकाश के दिन काटा गया, उसने पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है।

यह पूरा घटनाक्रम वन विभाग मुख्यालय से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर घटित हुआ, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी कटाई की कार्रवाई की भनक विभागीय अधिकारियों को पहले से नहीं लगी—या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि मकान निर्माण और भूमि पर कब्जे की नीयत से पेड़ों की कटाई की गई, जिसे प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त था।

सूचना मिलने पर सिविल लाइन पुलिस ने मौके पर पहुंचकर लकड़ी लोड कर रहे हाइवा और हाइड्रा वाहन को जब्त कर थाना पहुंचाया और मामले की जानकारी वन विभाग को दी। इसके बावजूद अब तक किसी जिम्मेदार अधिकारी का स्पष्ट बयान सामने नहीं आना प्रशासन की मंशा पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पेड़ काटने वाले कुछ लोग स्वयं को वन विभाग से संबंधित बता रहे थे, जबकि लकड़ी परिवहन से जुड़े व्यक्ति ने स्वयं को डिपो संचालक बताते हुए वन विभाग की अनुमति होने का दावा किया। यदि वास्तव में अनुमति थी, तो वह अनुमति किस आधार पर दी गई, और यदि नहीं थी तो अब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई—यह सबसे बड़ा सवाल है।

विशेषज्ञों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में निजी या राजस्व भूमि पर लगे नीलगिरी (यूकेलिप्टस) पेड़ों की कटाई के लिए SDM से पूर्व अनुमति अनिवार्य है। इसके साथ ही लकड़ी के परिवहन के लिए वन विभाग से एनओसी/ट्रांसपोर्ट परमिट जरूरी होता है। नियम स्पष्ट हैं कि बिना अनुमति कटाई पर भारतीय वन अधिनियम की धारा 68 के तहत 6 माह से 3 वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। बावजूद इसके, खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मामले को लेकर वन विभाग के अधिकारी मीडिया से बचते नजर आए। बार-बार संपर्क करने के बावजूद किसी भी जिम्मेदार अधिकारी की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। यह चुप्पी कहीं न कहीं प्रशासनिक मिलीभगत की ओर इशारा करती है।

पर्यावरण संरक्षण की बातें मंचों और पोस्टरों तक सीमित रह गई हैं, जबकि जमीनी हकीकत में हरे-भरे पेड़ों पर आरी चल रही है। यदि ऐसे मामलों में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की गई, तो “एक पेड़ मां के नाम” जैसे अभियान महज औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।

अब देखना यह है कि जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डाला जाता है या फिर वास्तव में दोषियों की पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाती है। कोरबा की यह घटना न केवल पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता और निगरानी तंत्र की विफलता का भी बड़ा उदाहरण है।

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