बस्तर की ‘दीदियों’ ने रसायनों को दी मात

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जगदलपुर, 03 मार्च, 2026/ बस्तर की ग्रामीण महिलाएं इस बार होली के पर्व को केवल रंगों के उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा के एक नए अध्याय के रूप में परिभाषित कर रही हैं। ‘बिहान’ योजना से जुड़ी ये दीदियां अपनी पारंपरिक रसोई और बाड़ी से निकले कुदरती खजानों जैसे पालक, लाल भाजी, चुकंदर और पलाश के फूलों को वैज्ञानिक विधि से सतरंगी गुलाल में तब्दील कर रही हैं। क्रांतिकारी डेबरीधूर उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र कुम्हरावंड में आधुनिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद क्षेत्र के विभिन्न स्व-सहायता समूहों ने रसायनों के खतरनाक प्रभावों को चुनौती देते हुए पूरी तरह इको-फ्रेंडली और चर्म-रोग मुक्त विकल्प तैयार किया है।

इस मुहिम में आड़ावाल के मां दंतेश्वरी स्व सहायता समूह, जगदलपुर के सरस्वती स्व सहायता समूह, गौरी स्व सहायता समूह, बजरंग स्व-सहायता समूह के साथ-साथ लोहंडीगुड़ा के मां संतोषी महिला समूह, तोकापाल की रोशनी स्व सहायता समूह, दरभा की दुर्गा स्व सहायता समूह, बास्तानार की दिशा स्व सहायता समूह और बकावण्ड की मुस्कान स्व सहायता समूह की महिलाओं ने भी इस कौशल को आत्मसात कर उत्पादन शुरू किया है। इस निर्माण प्रक्रिया की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें कॉर्न फ्लावर के आधार के साथ अपराजिता, हल्दी, चंदन और सिंदूर जैसे औषधीय तत्वों का समावेश किया गया है। इससे तैयार गुलाल न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुगंध से मन को भी हर्षित करता है। अपनी सूक्ष्म दृष्टि और कड़ी मेहनत का परिचय देते हुए ये महिलाएं फूलों और पत्तियों को सीधे धूप के बजाय छाया में सुखाकर उनके प्राकृतिक गुणों को सहेज रही हैं।

आज इन दीदियों की पहुंच केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके द्वारा निर्मित हर्बल गुलाल जगदलपुर के शासकीय कार्यालयों से लेकर रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के विक्रय केंद्रों तक अपनी पहचान बना चुका है। यह पूरी मुहिम ‘वोकल फॉर लोकल’ के संकल्प को धरातल पर उतारने का एक सशक्त माध्यम बन गई है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के परिप्रेक्ष्य में देखें तो बस्तर की ये आत्मनिर्भर महिलाएं न केवल अपनी आय बढ़ा रही हैं, बल्कि समाज को एक ऐसी सुरक्षित और खुशहाल होली का विकल्प भी दे रही हैं, जहाँ उल्लास के बीच सेहत से कोई समझौता न हो। जिला प्रशासन और तकनीकी विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में ग्रामीण महिलाओं का यह बढ़ता कौशल अब एक स्थानीय उत्पाद से कहीं आगे बढ़कर आत्मनिर्भर भारत की एक नई पहचान बन रहा है।

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