Saturday, August 30, 2025

फिर विवादों में उलझा नया ट्रांसपोर्ट नगर, बरबसपुर में फिर ट्रांसपोर्ट नगर की तैयारी, हाईकोर्ट-एनजीटी के आदेशों और राजनीतिक सवालों के बीच उलझा मामला

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कोरबा। बरबसपुर में नया ट्रांसपोर्ट नगर बसाने की कवायद एक बार फिर तेज हो गई है। तीन साल से अटकी इस योजना को पुनर्जीवित करने की चर्चाएं कई सवालों को जन्म दे रही हैं। कानूनी पेंच से लेकर राजनीतिक दखल तक—यह पूरा मामला अब फिर से सुर्खियों में है। इस पूरे मामले को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता अब्दुल सुल्तान ने जिला कलेक्टर से शिकायत की है।

दरअसल 2023 में अब्दुल सुल्तान बनाम राज्य शासन (WPC 615/2023) मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने निर्देश दिया कि यदि भविष्य में इस योजना को अमलीजामा पहनाया जाता है तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के दिशा-निर्देशों का पालन अनिवार्य होगा। याचिका में कहा गया था कि उक्त भूमि यह कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट से 200–500 मीटर दूरी तक किसी भी परियोजना की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह भूमि उससे लगी हुई है।

सूत्रों के अनुसार, तत्कालीन कलेक्टर संजीव झा और तत्कालीन नगर निगम आयुक्त प्रभाकर पाण्डेय ने खुद इस योजना पर सवाल उठाते हुए कहा था कि बरबसपुर क्षेत्र में इतनी बड़ी शासकीय जमीन उपलब्ध नहीं है। इसके बाद भुलसीडीह (झगरहा मेडिकल कॉलेज के बगल) में शासन की जमीन चिन्हित की गई थी, लेकिन शासन से अनुमति नहीं मिलने के कारण यह मामला वहीं अटक गया।

बरबसपुर में कुल 72.91 एकड़ भूमि नगर निगम को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए दी गई थी। लेकिन 18 सितंबर 2020 की अधिसूचना के तहत 40.36 एकड़ भूमि ट्रांसपोर्ट नगर के लिए अलग कर दी गई। सूत्रों के मुताबिक इसी जमीन से लगी भूमि सॉलिड वेस्ट प्लांट और मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल यूनिट के लिए 30 साल के लिए आरक्षित है। और पूरे शहर का मेडिकल वेस्ट व कचरा यहीं डिस्पोज किया जाता रहा है। यही वजह है कि योजना पर पर्यावरणीय और कानूनी सवाल खड़े हो गए।

बरबसपुर को लेकर चर्चाएं इस वजह से भी गरमाती रहीं कि पूर्व राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल और उनके परिवार व सहयोगियों की जमीनें इस प्रस्तावित क्षेत्र से लगी हुई बताई गईं। आरोप यह भी लगे कि कुछ विशेष लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए ही बरबसपुर को ट्रांसपोर्ट नगर के लिए चुना गया।

अब जबकि सरकार बदलते ही बरबसपुर को ही ट्रांसपोर्ट नगर बनाने की कवायद फिर से शुरू हो रही है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह मामला हाईकोर्ट के आदेशों की अवमानना (Contempt of Court) में बदल जाएगा ?
या फिर विरोधियों की ओर से नया केस दर्ज कर योजना को दोबारा रोक दिया जाएगा ?

फिलहाल नगर निगम और प्रशासन ने इस पर आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन अंदरखाने हलचल तेज है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिम्मेदार अधिकारी नियम-कायदों और अदालत के निर्देशों के बीच संतुलन साधकर क्या कदम उठाते हैं, या फिर बरबसपुर की यह कहानी एक बार फिर कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक देती है

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